जोधपुर (राजस्थान): जोधपुर से 22 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में हर साल पर्यावरण संरक्षण के प्रति अनूठे प्रेम को दर्शाने वाला शहीदी मेला लगता है। यह मेला भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को आयोजित होता है। इस मेले में देशभर से बिश्नोई समाज के लोग, पर्यावरण प्रेमी और विभिन्न जनप्रतिनिधि शहीदों को श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं। खेजड़ली शहीदी मेला: 363 बलिदानों की अमर गाथा
इतिहास की एक अमर गाथा
यह मेला 295 साल पहले 363 लोगों के बलिदान की याद में आयोजित होता है। साल 1730 में जोधपुर के महाराजा अभय सिंह अपने महल के निर्माण के लिए लकड़ी चाहते थे। जब उनके सैनिक खेजड़ली गांव में पेड़ काटने पहुंचे, तो अमृता देवी बिश्नोई ने उनका विरोध किया। उन्होंने कहा, “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” यानी “अगर सिर के बदले भी पेड़ बचते हैं, तो यह एक सस्ता सौदा है।”
अमृता देवी पेड़ों से लिपट गईं और सैनिकों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काट डाला। इसके बाद उनकी तीन बेटियों सहित 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। जब महाराजा अभय सिंह को इस घटना की जानकारी मिली, तो उन्होंने तुरंत पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी और बिश्नोई समाज को लिखित में वचन दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का पेड़ नहीं काटा जाएगा।
मेले में लाखों के गहने पहनकर आती हैं महिलाएं
खेजड़ली मेले की एक और खास बात यह है कि यहां महिलाएं लाखों रुपये के सोने के गहने पहनकर आती हैं। इसमें अधिकारी से लेकर व्यवसायी तक की महिलाएं शामिल होती हैं।

अद्वितीय आयोजन और मान्यताएं
प्रकृति प्रेम: यह मेला दुनिया का एकमात्र ऐसा मेला है जो वृक्षों की रक्षा के लिए हुए बलिदान की याद में लगता है।
श्रद्धांजलि: लोग हवन कुंड में नारियल की आहुति देकर शहीदों को नमन करते हैं।
मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा: इस साल बिश्नोई समाज के आराध्य जांभेश्वर भगवान के मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा भी की गई।
दूर-दराज से आए लोग: हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी लोग इस मेले में शामिल होने के लिए जोधपुर पहुंचे।
यह मेला न केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि बिश्नोई समाज आज भी वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा के लिए कितना प्रतिबद्ध है।
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